DM और अधिवक्ताओं के बीच बढ़ा टकराव,कार्यपालिका से न्यायिक शक्तियां छीनने की मांग, मुख्य सचिव को कानूनी नोटिस
Escalating Conflict Between DM and Advocates: Demand to Strip Executive of Judicial Powers; Legal Notice Issued to Chief Secretary
हरिद्वार/देहरादून,5 अप्रैल 2026 : जनपद देहरादून के जिला मजिस्ट्रेट (DM) और अधिवक्ताओं के बीच उपजा विवाद अब एक बड़े कानूनी और संवैधानिक मुद्दे में बदल गया है।
देहरादून के जिला मजिस्ट्रेट सवीन बंसल द्वारा कथित तौर पर वरिष्ठ अधिवक्ता और बार के पूर्व अध्यक्ष प्रेमचंद शर्मा के खिलाफ लाइसेंस निरस्त करने की शिकायत के बाद, अब कार्यपालिका (Executive) की न्यायिक शक्तियों को ही चुनौती दे दी गई है।
क्या है पूरा मामला?
हाल ही में DM सवीन बंसल ने कथित तौर पर अधिवक्ता अधिनियम 1961 (Advocate Act-1961) के तहत Bar Council को पत्र लिखकर प्रेमचंद शर्मा का लाइसेंस निरस्त करने पर विचार करने का अनुरोध किया था।
हालांकि, अधिवक्ताओं का पक्ष इसके विपरीत है।
आरोप है कि DM न्यायालय में वादों की सुनवाई मनमर्जी से की जाती है,
निर्धारित तारीखों पर सुनवाई नहीं होती और अगली तारीख की जानकारी भी वकीलों को नहीं दी जाती।
जब प्रेमचंद शर्मा ने इस अव्यवस्था पर आपत्ति दर्ज कराई, तो उनके विरुद्ध द्वेषपूर्ण तरीके से शिकायत की गई।
मुख्य सचिव को भेजा गया कानूनी नोटिस
इस मामले के सामने आने के बाद, हरिद्वार के अधिवक्ता कमल भदोरिया ने अपने काउंसिल अधिवक्ता अरुण भदोरिया के माध्यम से उत्तराखंड शासन के मुख्य सचिव और प्रमुख सचिव (विधि) को एक कानूनी नोटिस भेजा है।
इस नोटिस में DM, ADM, SDM और तहसीलदार जैसे कार्यपालिका अधिकारियों से न्यायिक व अर्धन्यायिक (Quasi-Judicial) शक्तियां वापस लेने की मांग की गई है।
नोटिस के मुख्य बिंदु और तर्क:
बिना विधि ज्ञान के न्याय पर सवाल:
नोटिस में कहा गया है कि यह विडंबना है कि एक विधि स्नातक (LLB) और कानून का विशेषज्ञ अधिवक्ता ऐसे अधिकारी के सामने कानून की व्याख्या करता है,
जिसके पास वकालत की पढ़ाई या विधिक अनुभव नहीं है।
ऐसे में निष्पक्ष न्याय प्रभावित होता है।
प्राकृतिक न्याय का हनन:
कार्यपालिका अधिकारी अक्सर प्रशासनिक दबाव में निर्णय लेते हैं।
वे स्वतंत्र रूप से न्याय करने के बजाय सरकारी अधिवक्ताओं की राय और उनकी ड्राफ्टिंग पर निर्भर रहते हैं,
जिससे आम जनता का उत्पीड़न होता है।
CRPC की धाराओं का दुरुपयोग:
नोटिस में उदाहरण दिया गया कि धारा 107/116 (BNSS के तहत अब नई धाराएं) के मामलों में पुलिस की गलत रिपोर्ट पर भी छह-छह महीने तक व्यक्ति को परेशान किया जाता है
और न आने पर वारंट जारी कर दिए जाते हैं।
स्वतंत्र ट्रिब्यूनल की मांग:
भारत के अन्य क्षेत्रों की तरह उत्तराखंड में भी ‘रेवेन्यू ट्रिब्यूनल एक्ट’ बनाकर स्वतंत्र न्यायिक तंत्र स्थापित करने की मांग की गई है।
प्रमुख मांगें:
विशेष न्यायाधीशों की नियुक्ति:
राजस्व और अन्य न्यायिक मामलों के लिए 50 वर्ष से अधिक आयु के अनुभवी अधिवक्ताओं को ‘स्पेशल जज’ के रूप में नियुक्त किया जाए।
कार्यपालिका को न्यायिक कार्यों से मुक्ति:
30 दिनों के भीतर DM, ADM और SDM से न्यायिक शक्तियां हटाकर विधिक रूप से प्रशिक्षित व्यक्तियों को सौंपी जाएं।
सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला:
नोटिस में सर्वोच्च न्यायालय के उन आदेशों का जिक्र है जिनमें कहा गया है कि न्यायिक कार्य केवल विधिक रूप से प्रशिक्षित व्यक्तियों द्वारा ही किया जाना चाहिए।
नोटिस में स्पष्ट कहा गया है कि यदि 30 दिनों के भीतर इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया,
तो उत्तराखंड उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (Public Interest Litigation) दाखिल की जाएगी।







