एक ‘मैसेज’ पर अस्पताल दौड़े डोईवाला के चार ‘रक्तवीरों’ ने बचाई सुशील की जान
Responding to a single 'message', four 'blood heroes' from Doiwala rushed to the hospital and saved Sushil's life.
देहरादून,1 अप्रैल 2026 : कहते हैं कि इंसानियत का कोई धर्म नहीं होता
और जब बात किसी की जान बचाने की हो, तो ‘रक्त’ ही वह धागा है जो हर मजहब और दीवार को तोड़कर सबको एक कर देता है।
बुधवार की सुबह डोईवाला में कुछ ऐसी ही कहानी लिखी गई,
जहाँ ‘एक मदद ब्लड ग्रुप समिति’ के जांबाज युवाओं ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वे जरूरतमंदों के लिए किसी फरिश्ते से कम नहीं हैं।
एक संदेश और दौड़ पड़े कदम
कहानी शुरू होती है जौलीग्रांट अस्पताल के ‘मिनी आईसीयू’ से,
जहाँ सुशील कुमार नाम के एक मरीज अपनी जिंदगी की जंग लड़ रहे थे।
उन्हें तत्काल कई यूनिट खून की जरूरत थी।
परिवार परेशान था और उम्मीदें टूट रही थीं।
तभी, यह सूचना ‘एक मदद ब्लड ग्रुप समिति’ के व्हाट्सएप ग्रुप पर बिजली की तरह कौंधी।
मैसेज पढ़ते ही डोईवाला के चार युवाओं— शाकिब अली, हजरत अब्दुस सुबहान, नईम अंसारी और अनीश अहमद ने अपनी सुध-बुध खो दी।
वे जानते थे कि अस्पताल में पड़ा वह शख्स उनके खून का इंतजार कर रहा है।
बिना वक्त गंवाए, ये चारों ‘रक्तवीर’ हिमालयन अस्पताल पहुँचे
और अपनी नसों से जीवन की धारा (रक्त) दान कर सुशील कुमार को नई उम्मीद दे दी।
“मशीन नहीं, सिर्फ इंसान बना सकता है खून”
संस्था के अध्यक्ष एडवोकेट साकिर हुसैन ने इस मौके पर एक बड़ी बात कही,
जो आज के दौर में हर किसी को समझनी चाहिए।
उन्होंने कहा:
“रक्त को किसी फैक्ट्री या मशीन में नहीं बनाया जा सकता।
यह सिर्फ एक इंसान के शरीर से ही प्राप्त हो सकता है।
इसलिए, रक्तदान से बड़ी कोई पूजा नहीं और इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं।”
बढ़ रहा है कारवां, जागरूक हो रहा है गाँव
समिति के सचिव आसिफ़ हसन इस कहानी के उस पहलू पर रोशनी डालते हैं जो भविष्य की उम्मीद जगाता है।
उन्होंने बताया कि अब डोईवाला के ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोग जागरूक हो रहे हैं।
समिति लगातार कैंप लगा रही है
और सुखद बात यह है कि अब ‘रक्तवीरों’ की फौज में हर दिन नए नाम जुड़ रहे हैं।
आज जब समाज में दूरियां बढ़ रही हैं,
डोईवाला की यह छोटी सी समिति और इसके ये चार युवा अपनी निस्वार्थ सेवा से यह संदेश दे रहे हैं
कि— “मदद का कोई चेहरा नहीं होता, बस एक नेक दिल होता है।”





