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प्रतिबंधित किताबें : क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए एक बड़ा झटका हैं ?

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रजनीश प्रताप सिंह तेज

देहरादून : बुकनर्डस , देहरादून की किताबों वाली कम्यूनिटी ने बीते रविवार को प्रतिबंधित व विवादित किताबों का एक हैंगआउट आयोजित किया.

यह बुकनर्डस का वार्षिक आयोजन है जिसमें उन किताबों को पढ़ने की स्वतंत्रता दी जाती है जो अपनी विवादित विषयवस्तु की वजह से प्रतिबंधित या बेहद चर्चित रहे.

इसके पीछे का कारण है – उन विषयों पर पाठकों को अपनी वैचारिक दृष्टिकोण विकसित करने की स्वतंत्रता देना .

किताबों को चाहने वाले ‘द ब्लू डोर’ , देहरादून में एकत्रित हुए.

उन्होंने प्रतिबंधित किताबों पर चर्चा की और उनके प्रतिबंधित होने के पक्ष और विपक्ष दोनों पर अपनी बात रखी.

बुकनर्डस के सह-संस्थापक रोहन राज ने सत्र की शुरुआत प्रतिबंधित और विवादास्पद पुस्तकों के पुराने आयोजनों के संक्षिप्त परिचय के साथ की । साथ ही चार प्रमुख चर्चाकर्ताओं और सत्र के लिए चुनी गई प्रतिबंधित पुस्तकों का भी परिचय दिया.

फिलिप ब्यूरेट ( मेंटर, मोटरसाईक्लिस्ट और वक्ता) , कीर्ति शेरॉन ( स्वव्यवसायी और स्टोरीटेलर ) , गौतम अग्रवाल ( व्यवसायी और एग्रीकल्चर विशेषज्ञ) और डॉ. सुनील आर. परब ( असोसिएट प्रोफेसर , दून इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल सांईसेज़) इस आयोजन के प्रमुख चर्चा कर्ता रहे.

सत्र में जिन किताबों पर चर्चा की गई वो थीं – हार्पर ली की ‘टू किल ए मॉकिंगबर्ड’ , खुशवंत सिंह की ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ , विक्टर ई. मार्सडेन की ‘द प्रोटोकॉल्स ऑफ द मीटिंग ऑफ द लर्नेड एल्डर्स ऑफ ज़ियोन ‘ तथा ऑड्रे ट्रुशके द्वारा लिखी – ‘औरंगजेब- द मैन एंड द मिथ’.

यह एक सार्थक चर्चा रही जिसमें कई दृष्टिकोण से बातचीत हुयी । अंत में चर्चाकारों और उपस्थित पाठकों के विभिन्न मतों को एक निष्कर्ष के तौर पर रखा गया । इस बातचीत के दौरान प्रतिबंधित किताबों की अनुशंसा भी की गयी.

बुकनर्डस की सह संस्थापक , नेहा राज ने चर्चाकारों और वेन्यू पार्टनर ब्लू डोर को किताबों के हैंपर्स देकर धन्यवाद ज्ञापन और सत्र का समापन किया.

 

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