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इन 4 कारणों से देहरादून एयरपोर्ट का नाम “अमर शहीद दुर्गामल्ल” के नाम पर रखने की मांग

Demand to name Dehradun Airport after 'Amar Shaheed Durga Malla'

 

देहरादून,12 अक्टूबर 2026 : आरटीआई एक्टिविस्ट सुरेंद्र सिंह थापा ने देहरादून के जौलीग्रांट एयरपोर्ट का नामकरण अमर शहीद मेजर दुर्गामल्ल के नाम पर करने की पुरजोर मांग उठाई है।

उन्होंने सरकार से अपील की है कि देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले इस वीर शहीद को यह सम्मान दिया जाना चाहिए

जिससे आने वाली पीढ़ियां हमेशा प्रेरित होती रहें।

उनका मानना है कि यह निर्णय न केवल जनभावनाओं का सम्मान होगा

बल्कि उत्तराखंड के महान स्वतंत्रता सेनानी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि भी होगी।

एयरपोर्ट के नामकरण के लिए शहीद दुर्गामल्ल ही सबसे उपयुक्त

आरटीआई एक्टिविस्ट सुरेंद्र सिंह थापा ने देहरादून विमानपत्तन के नामकरण को लेकर एक मुखर बयान जारी किया है।

उन्होंने स्पष्ट किया है कि देश के सभी स्वतंत्रता सेनानी और देश की रक्षा में प्राण न्यौछावर  करने वाले वीर नागरिक अत्यंत आदरणीय और सम्मानित हैं।

लेकिन जब सम्मानस्वरूप किसी एक ऐतिहासिक नाम को चुनने की बात आती है तो एक स्पष्ट प्राथमिकता तय होनी चाहिए।

उनके अनुसार इसमें स्वतंत्रता सेनानी और देश की आजादी के लिए लड़ने वाले शहीद सबसे पहले आते हैं।

उसके बाद देश की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति देने वाले अन्य वीर शहीद और तीसरे स्थान पर राजनेता आते हैं।

इस आधार पर जौलीग्रांट एयरपोर्ट का नामकरण शहीद दुर्गामल्ल जी के नाम पर करना सबसे अधिक तर्कसंगत और उचित है।

शहीद दुर्गामल्ल को चुनने के चार प्रमुख और ऐतिहासिक कारण

थापा ने जौलीग्रांट एयरपोर्ट के नामकरण के पक्ष में पांच महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक तर्क प्रस्तुत किए हैं।

पहला कारण यह है कि जिस भौगोलिक क्षेत्र में यह एयरपोर्ट स्थित है,

वही शहीद दुर्गामल्ल जी का जन्म स्थान भी है।

दूसरा कारण यह है कि उन्होंने देश को स्वतंत्र कराने के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया और वे एक महान शहीद थे।

तीसरा मुख्य बिंदु यह है कि वे आजाद हिंद फौज में शहीद होने वाले उत्तराखंड राज्य के पहले वीर सपूत थे।

चौथा और सबसे मार्मिक तथ्य यह है कि

यदि वे चाहते तो अंग्रेजों से माफी मांगकर अपनी तीन दिन की ब्याहता पत्नी के साथ सामान्य जीवन जी सकते थे।

वे आसानी से किसी बड़े पद पर आसीन हो सकते थे

या अपने क्षेत्र के एक संपन्न जमींदार की तरह रह सकते थे।

मगर उन्होंने व्यक्तिगत सुखों के बजाय देश की आजादी को सर्वोपरि चुना

और अपनी नवविवाहिता पत्नी को छोड़कर शहीद हो गए।

इन सभी महान बलिदानों को ध्यान में रखते हुए जौलीग्रांट एयरपोर्ट पर सबसे पहला हक शहीद दुर्गामल्ल जी का ही बनता है।

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